ज्योतिबा फुले यद्यपि ब्राह्मणवाद के हर एक षडयंत्र छल और फरेब को भली भांति जान समझ चुके थे किन्तु फिर भी उनके मन मे किसी भी ब्राह्मण व्यक्ति के प्रति कभी भी वैरभाव नहीं उपजा कई ब्राह्मण उनके अच्छे दोस्त थे।
सन् 1848 की बात है, जब ज्योतिबा फुले 21 वर्ष के थे। एक दिन वे अपने एक ब्राह्मण मित्र सखाराम शुक्ला के आमंत्रण पर उनकी बारात में सम्मिलित हुये। बारात मे वे ब्राम्हण के साथ-साथ चल रहे थे।
यह नजारा देख कर कुछ पुरातन पंथी ब्राह्मणों मे काना- फुसी होने लगी। ज्योतिबा फुले का ब्राह्मणो के साथ बारात मे आगे चलना उन्हे सहन नहीं हुआ।
वे घृणा के साथ बोले- अरे भाई, यह कुणवट शुद्र ब्राह्मणो की बारात मे कैसे घुस आया ?? इसको यहा किसने बुलाया ? उनके कटु वचन फुले जी के कानो मे भी पड़े इसी बीच एक गुस्सैल ब्राह्मण फुले जी के सामने आकर बोला- अरे वो, शुद्र के बच्चे याद रख हमारे साथ चला तो, तू शुद्र होकर भी हमारे साथ चलता है? क्या तेरे छुने से हम अपवित्र नहीं हो रहे? तु हमसे दूर चला जा। ज्योतिबा फुले जी को ब्राह्मण की घृणास्पद बात पर बहुत अचरज हुआ।फुले जी को ब्राह्मणों ने नीच शुद्र कहकर अपमानित किया और बारात से बाहर कर दिया। तब फुले जी घर आने लगे।तब उनके मन मे वैचारिक क्रान्ति होने लगी।
वे सोचने लगे कि मैं इतना पढा़-लिखा हूं, फिर भी सिर्फ बारात मे शामिल होने पर मेरा इतना अपमान किया गया, तो मेरे समाज के अशिक्षित लोगो के साथ कैसा व्यवहार होता होगा। गरीब अतिशुद्रों के साथ कैसा बर्ताव होता होगा।
मैं अपने इस समाज को मनुवादी व्यवस्था की गुलामी से आजाद कर दूंगा।यदि ऐसा नही कर पाया तो स्वयं को मृत्युदंड दे दूंगा। ऐसा सोचते-सोचते ही फुले जी घर चले गए।
दोस्तो सोचो हमारे महापुरूषो ( फुलेजी, साहूजी, आम्बेडकरजी) ने कितना बलिदान और त्याग किया तब जाकर हमे ये सामाजिक, आर्थिक, और मानसिक आजादी मिली आज हम जो कुछ भी है इन महापुरूषो के कारण है।
हमे हर हाल मे ये आजादी सम्भालकर रखनी है दोस्तों।।
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