शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2018

सखी पिला दे जितनी पिलानी हो एक बार। पीना हमें पसंद नहीं बार-बार का

लड़के हैं मोहल्ले के शैतान मेरी लैला।
तू इनसे बचा अपनी दुकान मेरी लैला।।

फूल है गुलाब का चमेली का न समझना।
आशिक हूं आपका किसी और का ना समझना।।

सखी पिला दे जितनी पिलानी हो एक बार।
पीना हमें पसंद नहीं बार-बार का।।

कांटा समझ के मुझसे ना दामन बचाएं।
गुजरी हुई बहार की एक यादगार हूं।।

शहरों में गस्त करते सहारा में खाक उड़ा ले।
तुमको भी ढूंढ लेंगे अपने को पहले पाले।।

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